गुरुवार, 30 सितंबर 2010

मेरी नास्तिक कलम

आज सोचा कि कुछ मंदिर लिखूँ,
आज सोचा कि कुछ मस्जिद लिखूँ |

राम को याद करते हुए कुछ लिखूँ,
अल्लाह को सलाम करते हुए कुछ लिखूँ |

खुद के धर्म को याद करूँ और कुछ लिखूँ,
कुछ को बदनाम करूँ और कुछ लिखूं |

रात पहर तक लिख न पाया सचमुच ऐसा कुछ,
क्यूंकि मेरी कलम नास्तिक हो चुकी है |


मेरी यह कविता आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रही है | आपके दो शब्द मेरी कलम के लिये स्याही समान जरूरी हैं | मेरा ईमेल pravincroy@gmail.com आपका प्रवीण

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

good poem

Kunal Singh ने कहा…

nice roy jeee