गुरुवार, 28 मार्च 2013


   होली मुबारक 


होली मुबारक हो, मित्रों/ सुभचिन्तकों/परिचितों/ 
सृष्टी में रचते बस्ते.........
तमाम कीड़ों मकोड़ों/जीव जंतुओं /पर्वत पहाड़/ नदी समुद्र .........
होली मुबारक हो.....होली मुबारक हो 

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013



     तुम्हारी खुशी की भाषा

एक पल 
पीछे हजारों पल            
ब्लैक एंड व्हाईट चलचित्र में 
चलने घुमने लगा 
मैं यहाँ खुश हूँ                                                                                                
फिलवक्त, 
इस पहर की ख़ुशी में 
ख़ुश हूँ | 
        
यहीं तुम्हारी खुशी की भाषा
मेरी खुशी की भाषा को  
ताक रही है |  
ये क्या खुशी 
तुम हँसी ... 
बड़ी जोर से हँसी ...

तुम्हे पढ़ा

तुम्हारा मुखड़ा पढ़ा हमने  
तुम्हारी खुशी की भाषा
मेरी भाषा नहीं बनेगी ।

अबके तय है ,

मेरी ख़ुशी में कोई भाषा हीं न रहे
वादा करता हूँ , 
तुम्हारी हँसी मेरी भाषा में जरुर रहेगी |  

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

पंछी की बाहें

 तुमने ही कहा था 
 अपनी डायरी में लिखा था . 



आज 
नीले गगन में पंछी की बाहें,
आसमां  से बड़ी हैं .
देखो तुम पंछी को,  
आसमां   जरुर दिखेगा 
अगर निहारोगे आसमां   
पंछी गुम मिलेगा . 

आज 
अपनी डायरी  में मैने भी लिखा है
नीले गगन में पंछी की बाहें
आसमां  से बड़ी हैं .

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

हे देवों के श्रीधर !

हे  देवों के श्रीधर !
स्वप्नों की दुनिया से जागो 
श्रींगार करो
प्रेम के इस बाग में
एक घर बनाओ बसाओ |

    लेकिन
    अपने गृह-प्रवेश का निमंत्रण पत्र
    इस शाब्दिक सुदाम को
    औपचारिकता तले ही सही
    अनिवार्य प्रेषित करना |

चरणों की दुहाई में
मंदिर के देवों ने कई दफा
मेरे पैरों में कील चुभोये
मैं चुप खामोश देखता सुनता रहा
मानो निर्जीव हूँ |

     हे  देवों के श्रीधर !
     यह तुम्हारी ही लीला थी 
     जो उस रात दर्द में कराहता रहा
     भूखे पेट मन में दहाङता रहा 
     और कालांतर का साथी सुदामा बना |



गुरुवार, 30 सितंबर 2010

मेरी नास्तिक कलम

आज सोचा कि कुछ मंदिर लिखूँ,
आज सोचा कि कुछ मस्जिद लिखूँ |

राम को याद करते हुए कुछ लिखूँ,
अल्लाह को सलाम करते हुए कुछ लिखूँ |

खुद के धर्म को याद करूँ और कुछ लिखूँ,
कुछ को बदनाम करूँ और कुछ लिखूं |

रात पहर तक लिख न पाया सचमुच ऐसा कुछ,
क्यूंकि मेरी कलम नास्तिक हो चुकी है |


मेरी यह कविता आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रही है | आपके दो शब्द मेरी कलम के लिये स्याही समान जरूरी हैं | मेरा ईमेल pravincroy@gmail.com आपका प्रवीण

सोमवार, 11 फ़रवरी 2008

सॉरी टीचर, मैने घर का धुंधला पता बताया था


एक स्कूली वाक्या, (अगस्त 1997 ) जो मैं कभी नहीं भूल सकता उस वक़्त मैं दसवी वर्ग में था. मुझे पटना जिला स्तरीय विज्ञान संगोष्ठी के आयोजन की जानकारी मिली और मैं उसमे क्लास के मित्रों के साथ जा बैठा, हांलाकि मैंने महज खानापूर्ति के लिये अपना ड्राइंग चार्ट (जो जैसे- तैसे खिंचा हुआ था) वहाँ प्रर्दशित किया और गाहे बगाहे चन्द पंक्तियाँ भी बोल गया घोर आश्चर्य! संगोष्ठी में मुझे दूसरा स्थान प्राप्त हुआ और इसके बाद मुझे प्रमंडल स्तरीय विज्ञान संगोष्ठी में झंडा बुलंद करना था. मेरे लिये यह बिलकुल नया अनुभव था इसके लिये फिजिक्स के टीचर डॉ रामकृष्ण प्रसाद को मुझे गाइड करने की जिम्मेदारी सौपी गयी. सर ने मुझसे कहा की 15 अगस्त को तुम्हे स्कूल में स्पीच देना है. इतना जानने के बाद मैं कहाँ स्कूल जाने वाला था. मै दूसरी तरफ प्रमंडल स्तरीय संगोष्ठी के भूत से भी डरा सहमा था, मन में सोचता था की इस दफा तो कई जिलों के मेधावी व तेज़-तर्रार लड़कों और लड़कीयों से भिड़ना होगा. लेकिन 15 अगस्त को स्कूल नहीं जाने के कारन रामकृष्ण सर मेरे घर आ पहुचे। मुझे दिन में चाँद नज़र आने लगा . मैने ये क्या आफत (संगोष्ठी) अपने गले में स्वंय बांधा है, शायद मैने ही उन्हे अपने घर का धुंधला सा पता बताया था और उन्होने मेरा घर पता कर लिया. लेकिन सर के सम्मुख मैं अपनी नासाज तबीयत का बहाना करने के सिवाय कुछ न कह सका. सर का मेरे घर आने का यह सिला रहा की मैं प्रमंडल स्तरीय विज्ञान संगोष्ठी में सिरकत करने पहुँच गया. घबराहट तोः बहुत हुई, लेकिन वहां अंत तक सर मेरा हौसलाअफजाई करते रहे. अंततः हश्र यह हुआ की मुझे पुनः प्रमंडल स्तरीय विज्ञान संगोष्ठी में द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ. मैं असहज अपने शिक्षक को देखने लगा, मैने देखा की सर के चेहरे पर असीम ख़ुशी है और इस ख़ुशी के पीछे मेरे प्रति पुनः एक नया आशावान भाव अंकुरित हो चला है.