गुरुवार, 27 जनवरी 2011

हे देवों के श्रीधर !

हे  देवों के श्रीधर !
स्वप्नों की दुनिया से जागो 
श्रींगार करो
प्रेम के इस बाग में
एक घर बनाओ बसाओ |

    लेकिन
    अपने गृह-प्रवेश का निमंत्रण पत्र
    इस शाब्दिक सुदाम को
    औपचारिकता तले ही सही
    अनिवार्य प्रेषित करना |

चरणों की दुहाई में
मंदिर के देवों ने कई दफा
मेरे पैरों में कील चुभोये
मैं चुप खामोश देखता सुनता रहा
मानो निर्जीव हूँ |

     हे  देवों के श्रीधर !
     यह तुम्हारी ही लीला थी 
     जो उस रात दर्द में कराहता रहा
     भूखे पेट मन में दहाङता रहा 
     और कालांतर का साथी सुदामा बना |



2 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर , पावन भाव

Kunal Singh ने कहा…

gud poem